
जन्म और प्रारंभिक जीवन
डॉ. राधानंद सिंह का जन्म 1 फरवरी 1954 को बिहार के कसबा ग्राम, शंभुगंज प्रखंड में हुआ। यह क्षेत्र तत्कालीन भागलपुर और वर्तमान बाँका जिले में स्थित है। उनके पिता बाबू मटुकनाथ सिंह और माता कबूतरी देवी थीं। परिवार के संस्कारों तथा गाँव के धार्मिक-साहित्यिक वातावरण ने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया।
शिक्षा और साहित्यिक संस्कार
प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हुई और 1970 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे टीएनबी कॉलेज से हिंदी प्रतिष्ठा में स्नातक तथा भागलपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर अध्ययन किया। महंत श्री चंचल प्रसाद झा, आचार्य आद्या प्रसाद सिंह कुंद, डॉ. श्रीहरि दामोदर और डॉ. तपेश्वर नाथ का उनके साहित्यिक विकास में विशेष योगदान रहा।
पुस्तकालय और अध्यापन से जुड़ा जीवन
26 सितंबर 1983 को उन्होंने केंद्रीय विद्यालय संख्या-1, गया में पुस्तकालयाध्यक्ष के रूप में योगदान दिया। वे 31 जनवरी 2014 तक वहाँ कार्यरत रहे। पुस्तकालय के कार्य के साथ उन्हें हिंदी अध्यापन तथा विद्यालय की अनेक गतिविधियों में भाग लेने का अवसर मिला।
गया की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियाँ
गया-प्रवास के दौरान उनका जुड़ाव गया जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन से हुआ। महामंत्री के रूप में उन्होंने साहित्यिक आयोजनों और प्रकाशनों में भूमिका निभाई। अरुण हरलीवाल के साथ संयुक्त संपादन में गया जिले के साहित्यकार : 20वीं शती उत्तरार्द्ध का प्रकाशन 2001 में हुआ।
लेखन और शोध की दिशाएँ
उनकी प्रमुख अध्ययन-दिशाओं में तुलसी साहित्य, मिथकीय समीक्षा, रामचरितमानस, गया का साहित्येतिहास और तीर्थ-संस्कृति शामिल हैं। मिथकीय अवधारणा और तुलसी साहित्य शोध-कृति है, जबकि सोने का मृग मारता छलाँग उनकी काव्य-साधना का परिचय देता है। विष्णुपदी और राष्ट्रिक भाष्य मानस को अलग-अलग अध्ययन-दृष्टियों से प्रस्तुत करते हैं।
संपादन और भक्ति-साहित्य
श्रीतुकाराम-गाथा : भावार्थबोधिनी हिंदी टीका में उनकी भूमिका संपादक की है। प्रो. श्यामसुंदर कलंत्री ने मराठी से हिंदी अनुवाद किया है। उपलब्ध पुस्तक-परिचय इस कृति को दो खंडों में वर्णित करता है। जीवन-वृत्त के कुछ पुराने अंश इसे प्रगतिरत कार्य बताते हैं; यहाँ पुस्तक-सूची के पूर्ण कृति वाले विवरण का अनुसरण किया गया है।
साहित्य-साधना की निरंतरता
प्राप्त जीवन-परिचय के अनुसार पुणे में भी उनका साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़ाव रहा है। उनकी रचनाएँ भक्ति, संस्कृति, सामाजिक संवेदना और साहित्यिक परंपरा के अध्ययन को एक साथ सामने लाती हैं।
आधार: उपलब्ध कराया गया जीवन-वृत्त “डॉ. राधानंद सिंह का व्यक्तित्व और कर्तृत्व” तथा पुस्तक-सूची।